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वार्षिक महोत्सव (निर्माण)

वार्षिक महोत्सव

पाश्चात्य संस्कृति की पिछलग्गू बनी भारतीय संस्कृति की अपंगता, नौकरी के बोझ तले कराहती मानवता, अँग्रेजी की मखमली मार से दम तोड़ती हिंदी भाषा और संसाधन,समय और बुद्धि के अपव्यय से पीड़ित भारतमाता... ऐसी भारत की ज्वलंत समस्याओं की जीवंत झाकीं का नजारा करवाया प्रतिभास्थली वार्षिकोत्सव निर्माण- 2018 ने ।

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वार्षिक महोत्सव

संयम पथ के अविराम यात्री 108 आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का 50वां दीक्षा वर्ष भारत में ‘संयम स्वर्ण महोत्सव’ के रूप में मनाया जा रहा है। इस भक्ति की धारा में निर्माण 2017 प्रतिभास्थली ने अपने प्राणदाता की आराधना के रूप में मनाया। आचार्यश्री के जीवन पर आधारित कार्यक्रम जैसे छाया नाटक, मूक अभिनय, रोशनी अभिनय, रेत कला, चरखा प्रस्तुति, योग, शास्त्रीय नृत्य आदि प्रस्तुत किये गये।

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वार्षिक महोत्सव

आकाश की ऊँचाईयों को छूने के साथ बहुत जरुरी होता है धरती से गहरा रिश्ता बनायें रखना, इसीलिए प्रतिभास्थली में पुनः संपन्न हुआ एक और वार्षिकोत्सव (निर्माण-2016) जहाँ संस्कार के धरातल पर अतीत की कल-कल से आने वाले भारत के पल-पल को सजाने के लिए छात्राओं ने कई विहंगम दृश्य और कार्यशालाएँ आयोजित की ।

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वार्षिक महोत्सव

खेती बाड़ी है ,
भारत की मर्यादा ,
शिक्षा साड़ी है ।

भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक आचार्य परमेष्ठी गुरुदेव 108 विद्यासागरजी महाराज के इन विचार पर आधारित प्रदर्शनी जिसका उद्देश्य - भारत के गौरवशाली अतीत की उत्पादनशील संस्कृति जीवंत हो, प्रत्येक नागरिक कर्मठ, उत्पादक, श्रमशील बने, वह सेवक नहीं स्वामी बनने की कला सीखे । जिसके विभिन्न विषय- जैविक कृषि, हथकरघा निर्मित वस्त्र, हस्तशिल्प कला, पाककला, विज्ञान व अध्यात्म का बेजोड़ नमूना इत्यादि ।

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2014

वार्षिक महोत्सव

पाश्चात्य संस्कृति रुपी दानवता के पगतले कुचलती भारतीय संस्कृति रूपी मानवता को जीवंत करने, अपनों से अपनों की पहचान करने, नारी जाती का सम्मान बढ़ाने और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की पहचान बनाने 'स्वर्ग से धरती पर उतरे गाँधी'

भारत के अतीत और आधुनिकता का तुलनात्मक अध्ययन भारत के प्रति गौरव जागृत करता है और शहीदों की स्मृतियाँ का रंगमंचन ह्रदय में देशभक्ति के हिलोरे पैदा करता है | इन्ही भावनाओं को साकार रूप देता है - निर्माण 2014

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2013

वार्षिक महोत्सव

जहाँ भारत कृषि, व्यापार, विज्ञान, कला, चिकित्सा व नक्षत्र विज्ञान का केन्द्र रहा वहीं चेतना को झंकृत करने वाले गुरु-शिष्य संबंधो की पावन भूमि रहा है । गुरु वह जो शिष्य का दोनों लोकों में मान बढ़ावें और शिष्य वह जो गुरु आज्ञा को ही जीवन माने - इन द्रश्यों को द्रष्टिगोचर करवाता है प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ ।

आधुनिकता की और ले जाते इण्डिया के स्थान पर भारतीयता की पहचान दिलाने वाले भरत के भारत का मान बढ़ाता निर्माण - 2013

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